Tuesday, 18 July 2017

प्याज तू रुलाता नहीं है

प्याज अब तू रुलाता नहीं है
20/- के ऊपर तू जाता नहीं है
'मोदी राज 'में तू सताता नहीं है
न्यूज चैनलों पर तू आता नहीं है
केजरी को नहीं देता तू कोई मुद्दा
राहुल के भी तू काम आता नहीं है
तुम्हारा 'सस्ता' अंदाज भाता नहीं है
तुम्हारा सुर्ख गुलाबी रूप अब लुभाता नहीं है
भाव खाती है हरेक सब्जी कभी न कभी
एक तू ही अपना रौद्र रूप दिखाता नहीं है
गरीब हो या अमीर, किसी को तरसाता नहीं है
'बुरे दिनों 'की याद दिलाता नहीं है
प्याज अब तू रुलाता नहीं है। 

आँगन का घड़ा

हमारे घर के बीचोंबीच एक बड़ा सा आंगन था. आँगन के चारों तरफ बरामदा था. एक तरफ कोने में अनाज पीस्‍ाने की चक्की होती थी. आँगन के पूरब तरफ के बरामदे में एक ताम्बे का घड़ा रखा रहता था. रोज सुबह उस घड़े में चापाकल का ठंडा और ताजा पानी भर दिया जाता था. उस समय एकमात्र चापाकल घर के पिछवाड़े में होता था. जाहिर है कि चापाकल तक पहुंचने के लिए कुछ दूरी तय करना पड़ता था. आँगन में रोज घड़े में पानी रखने का मकसद था कि घर के लोगों को खासकर बच्चों को बिना चापाकल के पास गए आँगन में ही पानी का स्रोत उपलब्ध कराना. हम बच्चे स्कूल के अलावा खाली समय में घर के आसपास मुहल्ले में ही दोस्तों के साथ खेलने कूदने में व्यस्त रहते थे. बीच बीच में जब प्यास लगती थी तो दौड़ कर उस तांबे के घड़े के पास जाते थे और चुल्लू के सहारे अपनी प्यास बुझाते थे. शायद वहाँ गिलास भी रहता होगा. लेकिन हम शायद ही उसका इस्तेमाल करते थे. रात में तो उस घड़े का महत्व और भी ज्यादा हो जाता था।रात में जब भी प्यास लगती थी तो वह तांबे का घड़ा ही हमारी प्यास बुझाने का एकमात्र जरिया होता था. हमारे घर के पिछवाड़े में एक छोटी सी बाड़ी होती थी जहां तरह तरह के पेड़ पोधे लगे हुए थे. वहीं पर चापाकल भी था तथा घर का शौचालय भी. रात में वहां अंधेरा होता था और घर के बच्चे या औरतें वहाँ जाने से डरते थे. कई सालों बाद आँगन में भी एक चापाकल लग गया. फिर धीरे धीरे तांबे के उस घड़े का महत्व कम होता गया. मुझे याद भी नहीं कि वह घड़ा वहां से कब विलोपित हो गया और कहां गया. अब तो स्मृतियों में उसकी याद ही बाकी है. कहना न होगा कि उस घड़े के पानी में जो शीतलता और मिठास हमें मिलती थी वह अन्यत्र दुर्लभ थी. 

Thursday, 23 March 2017

एक रसोइए का अपनी पत्नी के नाम पत्र

प्रिय,
बहुत बहुत याद !
कैसी हो? यह पूछना शायद बेमानी लगे फिर भी पूछ लेता हूँ.शायद इस प्रश्न के उत्तर में तुम्हे भाव प्रवाह का अवसर मिले.अपनी सुप्त अथवा उद्दीप्त कामनाओं को प्रकट करने का मार्ग मिले. विरह की वेदना कैसे व्यथित कर रही है ,इसे जानने का अवसर मिल सके .अथवा उस असीम धैर्य का परिचय मिल सके जिसके द्वारा तुम अपने अकेलेपन की पीड़ा को न सिर्फ सहन कर रही हो बल्कि अपनी जिम्मेवारिओं का भी अच्छी तरह निर्वहन कर रही हो.
रहा मेरा प्रश्न .मैं भी तो यहाँ अपनी जिम्मेवारियों के निर्वहन में ही लगा हुआ हूँ .अपने घर और गांव से सुदूर इस हिल स्टेशन के एक होटल में मुझे रसोइये का जो काम मिला हुआ है,उसको पूरी तन्मयता से करने की कोशिश कर रहा हूँ ,ताकि अपने परिवार का बोझ उठा सकूँ .यहाँ का मौसम बहुत ही सुहावना है .दूर दूर से लोग यहाँ छुट्टियां मनाने आते हैं .यहाँ के सुहाने और प्राकृतिक दृश्यों के बीच प्यार की भावना और भी पल्लवित और पुष्पित होती है .परन्तु मेरे भाग्य में तो विरह की आग में दग्ध होना ही लिखा है . यहाँ आने वाले पर्यटक मेरे बनाये खाने की तारीफ करते हैं .किन्तु मुझे तो तुम्हारे हाथों की बनाई हुई नरम मुलायम रोटियों की याद आती है . प्रिय कभी कभी मैं सोचता हूँ कि चूल्हे की आग से ज्यादा क्या विरह की आग दग्ध करती है ? तुम तो सोच सकती हो कि यहाँ का सुरम्य वातावरण और चारों तरफ प्रेमी जोडों की अठखेलियां देखकर मेरे ऊपर क्या बीतती होगी . पहाड़ों पर उड़ने वाले श्वेत श्याम बादलों को देखकर कभी कभी मन में यह भावना जागृत होती है कि काश मैं इन्हीं बादलों पर सवार होकर क्षण भर में तुम्हारे पास पहुँच जाता |अथवा फिर महा कवि कालिदास के मेघ दूतं की तरह इन बादलों के द्वारा अपनी प्रियतम के पास कोई सन्देशा ही भेज देता |परन्तु हाय रे भाग्य ! मेरे लिए तो यह भी संभव नहीं है |ह्रदय में भाव तो झंकृत होते हैं किन्तु उन्हें वाणी नहीं मिलती | हाँ , कभी कभी इन भावों को आंसुओं का अवलम्बन अवश्य मिल जाता है |तुम्हारी कुशलता का समाचार ह्रदय को सम्बल देता है |
प्रिय , कुछ ही दिनों में मुझे चन्द दिनों की छुट्टी मिलने वाली है |मैं उस दिन का बेसब्री से इंतजार कर रहा हूँ जब विरह की यह वेदना ख़त्म होगी और तुम्हारे चन्द्र मुख़ के दर्शन का आनंद मिलेगा |इसी सुखद घड़ी की प्रतीक्षा में ......

                                                                                                     तुम्हारा ही

Friday, 17 March 2017

मुठ्ठी में रेत

मुट्ठी में रेत की तरह फिसलती जा रही है जिन्दगी.
ख्वाब बहुत देखे, कुछ सच्चे कुछ झूठे.
कुछ ख्वाब हकीकत बने, कुछ हकीकत अफसाने.
कुछ ख्वाब ख्वाब ही रहे. कुछ ख्वाब हवा हो गए. मगर उनकी खुश्बू फ़ीजा में बाकी रही.
अब तो ख्वाब देखने से भी कतरा रही है जिन्दगी.
मुट्ठी में रेत की तरह फिसल जा रही है जिन्दगी.
रिश्ते बहुत बने. कुछ बन गए, कुछ बनाये.
कुछ निभ गए, कुछ निभाये गये.
कुछ टूट गए, फिर जुट भी गए.
कुछ जुटे भी तो बारीक निशां बाकी रहा.
कुछ ऐसे भी रिश्ते हैं जो अनकहे हैं, अबूझ हैं.
कुछ रिश्ते उनसे जो अब इस फानी दुनिया से दूर जा चुके
मगर इनकी खुश्बू हवाओं में जिन्दा है.
‌अब तो रिश्ते बनाने से भी कतरा रही है जिन्दगी.
मुट्ठी में रेत की तरह फिसल जा रही है जिन्दगी. .
काम बहुत किए, कुछ सही कुछ गलत
कुछ स्वयं किए, कुछ करवाए गए
कुछ से खुशी मिली, कुछ से पश्चाताप हुआ
कुछ कर्मो से मन की तृप्ति मिली, कुछ से आत्मा की
कर्म और भाग्य के भंवर में फंसकर
डूबती उतराती जा रही है जिन्दगी
मुट्ठी में रेत की तरह फिसलती जा रही है जिन्दगी.
प्यार मिला भी, प्यार किया भी
कुछ प्यार सच्चे थे कुछ झूठे
कुछ प्यार सपने ही रहे
कुछ सपने प्यारे लगे
कुछ ने दर्द दिए, कुछ ने दर्द बांटे
प्यार और दर्द की परतों में
फंसती निकलती जा रही है जिन्दगी
हर रोज नया फलसफा सिखा रही है जिन्दगी
मुट्ठी में रेत की तरह फिसलती जा रही है जिन्दगी.
राज कुमार

Saturday, 15 October 2016

सिनेमाहॉल की रिकॉर्डिंग

   सिनेमा हॉल की रिकार्डिंग 


हमारे जैसे लोगों को बहुत से पुराने फिल्मी गाने अभी तक याद हैं. मैं पुराने दिनों को याद करता हूँ तो अपने संबंध में मुझे मुख्य रूप से इसके दो कारण लगते हैं. पहला रेडियो. अपने स्कूल के दिनों में रेडियो हमारे मनोरंजन का लगभग एकमात्र साधन था.रेडियो पर बराबर गानों को सुनते रहने से अधिकांश गाने याद हो जाते थे. रेडियो की बातें मैं फिर कभी करूंगा. आज एक दूसरे चीज की चर्चा करूंगा. उस समय हमारे कस्बे में एक मात्र सिनेमा हॉल हुआ करता था और उसमें तीन शो चलते थे मैटिनी, इवनिंग एवं नाइट शो. सिनेमा हॉल के सबसे ऊपर एक लाउडस्पीकर लगा हुआ होता था. जब भी शो शुरू होने वाला होता था तो लगभग आधे घंटे पहले उस लाउडस्पीकर से गाने बजने लगते थे जो शो के शुरू होने तक बजते रहते थे. इस लाउडस्पीकर की आवाज लगभग पूरे गांव में सुनाई पड़ती थी. लाउडस्पीकर की आवाज एक तरह का संकेत थी कि शो अब शुरू होने वाला है. हमारे कस्बे में आम बोलचाल की भाषा में सिनेमा हॉल से बजने वाले गाने को रिकार्डिंग (recording) कहा जाता था. यानि सिनेमा हॉल से रिकार्डिंग चालू होने का अर्थ था एक शो समाप्त हो गया और दूसरा शो शुरू होने वाला है. मान लो कि दो दोस्त फिल्म देखने जाने वाले हैं. वे आपस में बात करेंगे - "यार रिकार्डिंग शुरू हो गई है, जल्दी सिनेमा हॉल चलते हैं." मान लीजिये कि किसी स्त्री का पति सिनेमा देखने इवनिंग शो गया है और घर पर पत्नी उसके लौटने का इंतजार कर रही है. तो उसके कान रिकार्डिंग सुनने के लिये लगे रहते हैं. जैसे ही शो खत्म होता है और रिकार्डिंग चालू होती है, पत्नी समझ जाती है कि पति अब कुछ ही देर में घर पहुंचने वाला है. अब आप पूछेंगे कि रिकार्डिंग का मतलब तो गाना रिकार्ड करना होता है, न कि  लाउडस्पीकर पर गाना बजाना. बिलकुल ठीक. लेकिन हमारे गाँव का यही रिवाज था. शायद अन्य जगहों पर भी हो.
अब एक बात और. हमारे गाँव के सिनेमा हॉल की 'रिकार्डिंग' में एक और खासियत थी. वो ये कि जब भी किसी खास फिल्म के गानों को बजाया जाता था तो अगले एक महीने तक उन्ही कुछ गानों को बार बार बजाया जाता था. जाहिर है कि जब एक ही गाने को बार बार दिन में कम से कम तीन बार रोज सुना जायेगा तो वह गाना धुन सहित याद हो ही जायेगा. यानी सिनेमा हॉल की 'रिकार्डिंग' सुनकर लोगों के दिमाग में उन गानों की एक तरह से रिकार्डिंग हो जाती थी.
इस तरह बहुत से पुराने गानें सिनेमा हाल की रिकार्डिंग की बदौलत अभी भी हमें याद है. हालांकि कभी कभी गाने इतने चालू किस्म के होते थे कि दो चार दिन सुनने के बाद ही लोग उब जाते थे. जैसे एक गाना था - "बैठ जा बैठ गइ, खड़ी हो जा खडी हो गइ" दूसरी बात, जो गाना सिनेमा हॉल से बज जाता था उसे दुबारा रेडियो पर सुनने की हिम्मत नहीं होती थी.
द्वारा राज कुमार 

Sunday, 13 March 2016

'तारक मेहता का उल्टा चश्मा' धारावाहिक के दादाजी का शब्द चित्र प्रस्तुत है |

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टप्पू  के दादाजी यानि जेठा लाल के पिताजी एक बहुत ही सीधे सादे व्यक्तित्व के मालिक हैं. उनकी दुबली पतली काया है. वेश भूषा पारम्परिक गुजराती परिवार के मुखिया की है. धोती कुरता या पैजामा बंडी और सर पर टोपी।  जब बाहर निकलते हैं तो हाथ में छड़ी  होती है. स्वाभाव से बहुत ही सीधे एवं नरम किन्तु जरुरत पड़ने पर तुरत ही गरम भी हो जाते हैं. स्वभाव में जिद्दीपन भी है जो टप्पू के शादी रचवाने वाले प्रषंग में सामने आता है. उनका बचपन गावों में बीता है और वहां की स्मृतियाँ अभी भी उनके जेहन में जीवंत है. बचपन के दोस्तों को वे अभी भी याद करते हैं.

दादाजी हमारे पारम्परिक मूल्यों वाले भारतीय परिवार के प्रतीक हैं. परिवार  में एक बुजुर्ग की हैसियत से उनका उचित मान सम्मान है. जेठा लाल  या उसकी पत्नी दया कभी भी उनसे  गर्दन उठाकर  बात करने की नहीं सोच सकते. उनकी बातों का सभी क़द्र करते हैं. जरुरत पड़ने पर वे जेठा लाल को डाँट सकते हैं और उसे उसके बचपन की कारगुजारियां याद दिला सकते हैं. टप्पू एवं अपनी बहु दया को वे बहुत प्यार करते हैं और कभी भी उन्हें डांटते फटकारते नहीं हैं. जेठा  से विवाद की स्थिति में उनका ही पक्ष लेते हैं. सोसाइटी में भी एक बुजुर्ग की हैसियत से उनका उचित मान सम्मान होता है. विशिष्ट अवसरों पर उन्हें एक नेतृत्व कर्ता की भूमिका दी जाती है. बिना मांगे वे कोई सलाह नहीं देते हैं किन्तु यदि कोई सलाह देते हैं तो उसे सभी स्वीकार करते हैं.

 सामान्यतः वे अपनी स्वयं की दिनचर्या का पालन करते हैं. सुबह में अखबार पढ़ना और फिर टहलने निकलना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है. अखबार पढने की भी उनकी विशिष्ट शैली है. चश्में के ठीक नीचे अखबार को लाना और फिर उसे जल्दी जल्दी बाये से दांयें करना मानो वे पृष्ठ को स्कैन कर रहे हों.

दादाजी सामान्यतः परिवार की बातों या समस्याओं में उलझते नहीं हैं बल्कि इन सबसे निर्लिप्त वे अपनी दिनचर्या में मशगूल रहते हैं , जब तक कि कोई समस्या उनके सामने नहीं लाई जाए. जाहिर है जब  समस्या बड़ी हो जाती है तभी उसे दादाजी के सामने लाया जाता है और यह भी स्पष्ट है कि ऐसे मामलों में सबसे पहली डाँट ‘जेठिया’ यानि जेठा लाल को ही सुननी पड़ती है.
                             
 दादाजी सम्माननीय हैं , प्यारे हैं और आज के भौतिक युग में जहाँ पारिवारिक मूल्यों का अवमूल्यन हो रहा है , वे दर्शको को पारिवारिक मूल्यों का बोध कराते हैं।  आस्चर्य है कि पूरी सोसाइटी में बाक़ी सारे परिवार न्युक्लीअर यानि एकल परिवार हैं जहाँ किसी बुजुर्ग का कोई अस्तित्व नहीं है. ऐसे में दादाजी रेगिस्तान में नखलिस्तान की तरह हैं और समाज में बुजुर्गो के महत्व तथा उनकी आदर्श भूमिका को रेखांकित करते हैं.

                                                                                       द्वारा राज कुमार